खगड़िया
...बस जिंदा रहे इंसानियत, यकीन रखें कि 'भंवर' में फंसी 'इंसान और इंसानियत' की कश्ती जल्द ही साहिल पर पहुंच जाएगी,डीएम डॉक्टर आलोक रंजन घोष के मार्मिक पोस्ट ने भी इंसानियत को झकझोड़
राजेश सिन्हा कोरोना महामारी की बढ़ती दूसरी लहर ने इंसानों की जिंदगी के साथ-साथ शायद इंसानियत की भी जान लेनी शुरु कर दी है।स्थिति यह बन गई है कि शासन-प्रशासन को कोसने में लगे कुछ चुनिंदा लोग मुसीबत की इस बेला में अपने खून के रिश्तेदारों को भी पहचानने तक से इंकार करने लगे हैं।रुपये-पैसे और पैरवी कहीं काम नहीं आ रहे हैं।सरकारी के साथ-साथ गैर सरकारी अस्पतालों मे


कोरोना महामारी की बढ़ती दूसरी लहर ने इंसानों की जिंदगी के साथ-साथ शायद इंसानियत की भी जान लेनी शुरु कर दी है।स्थिति यह बन गई है कि शासन-प्रशासन को कोसने में लगे कुछ चुनिंदा लोग मुसीबत की इस बेला में अपने खून के रिश्तेदारों को भी पहचानने तक से इंकार करने लगे हैं।रुपये-पैसे और पैरवी कहीं काम नहीं आ रहे हैं।सरकारी के साथ-साथ गैर सरकारी अस्पतालों में भी मरीज अटे पड़े हैं।शमशान और कब्रिस्तानों में लाशों की ढ़ेर पड़ी है।बूढ़ी नजर के हो चुके इंसानों सहित अधिकांश लोगों का कलेजा शमशानों में जलती चिताएं और कब्र स्थानों में दफन होते जनाबों के शव को देखकर तो क्या,सुनकर ही फट रहा है।
लेकिन कफन में भी पॉकेट तलाशने के आदि हो चुके लोग इस विकट परिस्थिति में भी धन कमाने का अवसर तलाशने में लगा है।कहा जा सकते है कि इंसानों को पहचानने से भी इंसान परहेज करने लगे हैं। ---- टीवी चैनलों पर नजरें टिकाए बैठे दर्शकों के सामने दिल दहला देने वाले नजारे व स्टोरी परोसे जा रहे हैं।टीआरपी के फिराक में सनसनीखेज खबरें दिखाई जा रही है।शायद साकारात्मक खबरों से सरोकार नहीं रह गया हो।वरिष्ठ पत्रकार व साहित्कार रंजन वर्मा,शंभू शरण सिंह,प्रोफेसर अरविन्द कुमार सिंह,प्रभात सुमन,आजाद राजीव रंजन सहित अन्य वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि स्वस्थ्य होकर घर लौटे लोगों से मिलकर खबर बनाने की कोशिशें अगर हो, तो कहा जा सकता है कि समाज के सभी लोगों के मनों में साकारात्मक विचारों का उदय होगा और नाकारात्मक बातें दम तोड़ेगी। --- बात अगर समस्याओं की करें तो, इस विकट समय में जाहिर तौर पर विभिन्न तरह की समस्याएं भी सूरसा के समान मुंह फैलाती जा रही हैै।
हमारी आपकी सबकी ज़िम्मेदारी है कि लोगों में आशा जगाए रखें और एक ऊर्जा संचारित करें।
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अभी कई समस्यायें और भी आएंगी। ये नहीं पता कि ये कब तक चले। तो क्या हम सब मिलकर लोगों का उत्साह वर्धन कर सकते हैं क्या ?
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उम्मीद की किरण दिखे तो रोगी जल्दी ठीक हो जाते हैं और इसका वैज्ञानिक प्रमाण है। तो मेरी अपेक्षा है कि कोविड को मात दे चुके लोगों से मिलें, उनके अनुभवों को साझा करें, कुछ परिवारों से मिलें जिन्होंने अपने परिजनों को खो कर ज़िंदगी में वापसी की हो, कुछ डॉक्सटर्स एवं स्वास्थ्य कर्मियों की बात सुनें जिन्होंने तन मन से लोगों की सेवा की हो।
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आइये सब मिल कर एक सकारात्मक माहौल तैयार करें।इसके अलावा मैं सारी शिकायतों को सहर्ष स्वीकार करूंगा जो आप दिखा रहे हैं, सुना रहे हैं और पढ़ा रहे हैं। वो भी करते रहिए इससे मेरी टीम को सुधार लाने का अवसर मिलता है।" बहरहाल,यह कहने में शायद कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भंवर में फंसी 'इंसान और इंसानियत'की किश्ती को बचाने के लिए हम सभी दूर रहकर भी साथ-साथ चलें।इसलिए अंत में एक बार फिर यह आग्रह है कि इस मुहिम में शामिल होकर इंसान के साथ-साथ इंसानियत को भी बचाएं।।
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